Saturday, October 02, 2010

विचार परिभाषा -

श्रद्धा - 
करै काज मान हर्ष सो अरु आलस्य न होय,
वेद वचन विश्वास दृढ़ श्रद्धा कहिये सोय,
छमा -
परुष वचन सुनि जगे नहीं होय न मन में खेद,
सहे हानि अरु खाय गम,यही छमा कर भेद ,
मित्र -
मित्र न छोड़े मित्रता कैसो करै बिगार,
जिमि गृह जारत अगन है ,करत अग्नि को प्यार ,
संत-
पर दुःख देवे को द्रवै ताको कहिय असंत,
पर दुःख देखत जो द्रवै ताको कहिये संत ,
धर्म-
परहित सम नहीं धर्म कछु धर्म कहत हैं दान,
नित्य वेद मारग चलै परम धरम यह मान ,
कहेउ वेद में धर्म के चार चरण पहिचान,
प्रथम सत्य पुनि दया है और तपस्या दान ,
और तपस्या दान सत्य से उत्पत्ति होई 
नास होत है लोभ से क्रोध से दूरी रहई,

3 comments:

amit said...

bhupendra ji
aapne bahut achhi panktiyan likhee hain,padkar bahut hee khushee hui
amit

kapil said...

bhupendra ji
bahut hee achha likha hai aapne ,aapka lekhan kary bahut achha hai
dhanywad
kapil singh

kapil said...

aap aise hee likhate rahen