श्रद्धा -
करै काज मान हर्ष सो अरु आलस्य न होय,
वेद वचन विश्वास दृढ़ श्रद्धा कहिये सोय,
छमा -
परुष वचन सुनि जगे नहीं होय न मन में खेद,
सहे हानि अरु खाय गम,यही छमा कर भेद ,
मित्र -
मित्र न छोड़े मित्रता कैसो करै बिगार,
जिमि गृह जारत अगन है ,करत अग्नि को प्यार ,
संत-
पर दुःख देवे को द्रवै ताको कहिय असंत,
पर दुःख देखत जो द्रवै ताको कहिये संत ,
धर्म-
परहित सम नहीं धर्म कछु धर्म कहत हैं दान,
नित्य वेद मारग चलै परम धरम यह मान ,
कहेउ वेद में धर्म के चार चरण पहिचान,
प्रथम सत्य पुनि दया है और तपस्या दान ,
और तपस्या दान सत्य से उत्पत्ति होई
नास होत है लोभ से क्रोध से दूरी रहई,
Geeta Gyan Prashnottari
12 years ago






